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Kaliyug ka Mahabharat (Mahabharata of Kaliyuga (Dark Period)

कलियुग के संदर्भ मैंने कृष्ण से वार्तालाभ किया ,
क्या फिर से सतयुग आयेगा इसका भी प्रमाण लिया |
इस कलियुग के धृतराष्ट्र को अंधे होने का वरदान दिया,
सच की टकसाल को तुच्छ होने का अहसास दिया ,
दुर्योधन रूपी आकांशा एवम अभिमान को श्र्ष्ठता का वरदान दिया ,
दुशाशन के कृत्यों को भरी महफिल में सलाम किया |
चौसट के खेल को इसीलिए विश्व में सम्मान दिया ,
शकुनि रूपी आत्माओ को महात्मा होने का स्थान दिया |
बोल गीता माँ इस विश्व में सदाचार को कैसा कलियुगी अभिशाप दिया ,
कृष्ण बोल के थक गया , अर्जुन का बाण भी हो गया परास्त |
फिर महाभारत की संरचना का ये कैसा अभिप्राय मिला ,
हर युग हुआ संहार का सूचक, अंत में अधर्म का नाश किया ,
यह मनुष्य की संरचना ही थी भयंकर , जिसने संपूर्ण पृथिवी का सर्वनाश किया |
कृष्णा ने प्रस्तुत किया था उदाहरण , जो हर युग में क्रांति का सूचक बना ,
जो कहना चाहता था कुछ और शायद हमने और कुछ सुना |
इस पंक्ति के करता हु समाप्ति ,
अवोभायग्य हमारे जो फिर से कलियुग ने महाभारत रूपी अमृत का पान किया |
धन्यवाद !

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Vigyan(The Science): Ek Saral Rahasya (One Simplest mystery)

नमस्कार ! दी स्कॉलैस्टिक कि श्रृंखला में आपका स्वागत है | प्रकृति की इस नायाब दुनिया में बहोत से ऐसे रहस्य जो यथावत साधारण मानव के अधिकार क्षेत्र से परे है | इसके अनेक संदर्भ हमे हर समय होने वाली घटनाओ से पता चल जाता है | उसी प्रकार से मनुष्य का शरीर भी पांच महाभूतों की अनन्य श्रेणियों अलग अलग चरण में ना ना प्रकार के अनुभव होते है | इन अनुभवों को शायद सामान्य मनुष्य अपनी दैनंदिन के कामो में उलझे रहने के कारन पहचान नहीं पाता है , और उसे केवल मिथ्या या कल्पनाओ का आधार बताकर उन चीज़ो को टाल दिया करता है ; परनतु उससे होने वाले परिणाम जब सामने आते है तो चकित एवम हक्का बक्का रह जाता है | वर्त्तमान स्थिति में विज्ञानं को न केवल किसी औपचारिकता का दास बनाया गया है बल्कि उसका हनन भी किया गया है | मनुष्य विज्ञानं अनुक्रमण में आज हम बात करेंगे , उस विज्ञानं की जिसे बस ह्रयास का पात्र बनाया गया है | क्युकी मौजूदा स्थिति में इन घटनाओ की किसी ठोस सबूत न होने के कारन , इस शास्त्र को इस कलियुग के घिनोने दौर से गुजरना पद रहा है | इसी कारन कुछ बातो सरलता के से समाधान हो सके , इसीलिए हमने इस लेखन का चयन किया है | विज्ञानं की बातो को समझने के लिए हमे एक बात तो निश्चित करनी होगी , की आखिर इस काल में विज्ञान को ही क्यों शास्त्र बनाया गया है , और हमे हर विषय पर तर्क की ही क्यों आवश्यकता पड़ती है| क्यों , विश्वास की धरातल इतनी कमजोर हो गयी है , की जो चमत्कार हमे स्वयं अपने हाथो से करते थे , उनके लिए आज मानव निर्मित यंत्रो का उपयोग किया जा रहा है | विज्ञान , यह शब्द दरअसल किसी घटना के ज्ञान के सन्दर्भ में किया जाता है| और जब उस घटना का विशलेषण किया जाता है तो परपस्परिक रूप से वो ” विज्ञानं ” की मूलभूत उपाधि दी जाती है | किन्तु आज के काल में विज्ञान शब्द की धज्जिया उड़ा दी गयी है, आज हिंदी में कहे जाने वाले वैज्ञानिक संज्ञाओं झकझोर के रख दिया गया है | आज की शिक्षा प्रणाली , भाषाओ में उच्चता और नीचता के निर्णायक मापदंड बन चुके है | और हमारे मूलभूत सिद्धांतो को पतन की और अग्रसर हो रहे है | इन्हे अंकुश लगाना हमारे हाथ में है , उद्धार या पतन इसमें से किसी एक चुनना होगा ! आज के मनुष्य में मस्तिश्क के शुक्षम चक्षु , निष्क्रिय होते जा रहे है | जिसके कारण , सोचने और समझने की शक्ति को हर एक मापदंड की आवश्यकता पद रही है | जिस विज्ञानं की धरातल पे सबकुछ सामान्य उसे भी अनावश्यक तरीके से उलझा कर उसे प्रस्तुत किया जा रहा है | मनुष्य के जन्म के समय , अनेको ब्रम्हांड की गतिविधियों के कारण, ग्रहीय तालमेल बैठने या न बैठने के कारण , उनका प्रभाव मनुष्य शरीर पर प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष तरीके से पड़ता है | ठीक उसी प्रकार से जैसे की किसी इंसान के बोलने पर सामने वाले व्यक्ति पर उसका या तो सकरात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | जिस के करण, वह प्रभाव अल्पभाव , दीर्घाभाव में देखा जा सकता है | जैसे की , किसी दवा को धारण करने के बाद उसके प्रभाव शरीर पर पड़ते है ठीक उसी प्रकार से यह प्रभाव होते है | मनुष्य का शरीर हर समय अनेक तरंगो को उत्पन्न करता है , अगर इसे पहले के प्रभाव से जोड़कर देखा जाये तो हमारे मित्र (सकारात्मक ) और शत्रु (नाकाररत्मक ) का मिलजुला असर होता है | इसी प्रकार से संपूर्ण ब्रम्हांड में हम एक दूसरे से शारीरक , मानसिक रूप से भिन्न होते हुए भी हम आध्यात्मिक रूप से सहज है | जिस कारन हम किसी न किसी के साथ सम्भन्ध से जुड़े हुए है | घटना का स्वरुप कैसा भी हो पर उसकी नीव एक है , और एक ही मूलभूल सिद्धांत पे चलने वाले है | इसी कारन से प्रत्येक मनुष्य में किसी चीज़ो की अधिकता तो किसी तत्वों की न्यूनता का परिचायक होता है | इसप्रकार , सबसे पहले सोच का मेलभाव , फिर मित्र में तबदीली , फिर रिश्तेदारी (घनिस्टता ), फिर सगेसम्बन्धिया बनाना और फिर विनाश की और अग्रसर होने | यह सृष्टि के वैधानिक रूप कालांतर , देश , दिशा और समय के मापदंड अनुसार चलता आ रहा है | प्रकृती के इन्ही भौतिक नियम को समझने के प्रयास और उन्हें समझने हेतु प्राकृतिक उदाहरण का उपयोग किया जाता है | या संक्षिप्त में कहा जाये तो इसे असल मायने में “विज्ञानं” कहा जाता है | इसी के साथ इस कड़ी के साथ हम इजाजत चाहते है | इस खंड में उपयोग कि हुई भाषा या कथन से किसी के मन को पीड़ा पहुँची हो तो क्षमा करे ! ध्यानवाद !

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Goddess Lakshmi prayer to overcome Financial crisis

हे , महामाया महालक्ष्मी इस दिन दरिद्र भक्त की अर्ज सुनलो माँ ,
हे पद्मप्रिये विष्णुविलासिनि अब यह संकट को तारो माँ |
सुख -दुःख तो है सांसारिक भवसागर उसमे तुम ममता की नैय्या ,
चंचल रूप तुम्हारा देख हर मनुष्य की मिलती है दुःख की शैय्या |
ब्रम्हांड बना उत्पत्ति का सूचक , तुम दया की हो टकसाल,
वास्तविक रूप में जन जन के घर में निवास करती हो, ए ऊर्जावान ,
मै मुर्ख अपनी अज्ञानता में करता रहा तुम्हारा तिरस्कार,
किस मुख से करू अर्चना , भोग रहा हु तुम्हारा क्रोध विकराल |
स्वाधिस्ठान में तुम हो विराजित , मैंने पीड़ित किया तुम्हे दिन रात,
सत्य और ज्ञान का आधार हो तुम , न जान सका इस श्रुष्टि का विधान,
तुम्हारी चंचलता को देख , मन में अस्थिरता छायी ,
मस्तिस्क हो गया रोग ग्रस्त , नाना प्रकार की यातना आयी |
जन -मानस में हो तुम ज्ञान का प्रकाश , हे माँ उन् सब पे दया करो ,
अपनी स्तंभित कर देने वाली आभा से , उनका भाग्य प्रकशित करो |
नित चर एवम स्थिर रूप में उनके घर में निवास करो,
अपनी ममता से उन्हें दिन प्रतिदिन पोषित करो ,
अज्ञान रूपी उन्माद प्रत्येक मनुष्य के अंदर जागेगा ,
उसके आत्मा की पगडण्डी बनकर , उनका मार्ग प्रशस्त करो |
लक्ष्मी निहित हर प्रकार की ऊर्जा उस दिन मनुष्य के मन घर कर जाए ,
चाहकर भी वो मनुष्य अवचेतन ना हो पाए , भक्ति के सत्यार्थ को पान कर ,
वो फिर झिलमिलाये |
प्रारब्ध के बदलने की इच्छा उसे जगाये |
हो पुरुषार्थ की मूरत तुम आंतरिक भ्रमांड का संतुलन बनो ,
हर रूप में पूजी जाती हो तुम , अब नीज जन का उद्धार करो |
मनुष्य है दैवी और राक्षसःशी गुणों का धर्ता ,
उसका तुम आध्यात्म ज्ञान बनो, अपनी इस श्रुष्टि को फिर से नैतिक और ऊर्जावान करो|
भोग रहा है , भक्त तुम्हारा दारिद्रय की बेला को,
हर क्षण बना उपहास का पात्र , हुआ अपमानित हर गोधूलि बेला को ,
मनके , चांदी , सोना , वस्त्र एवम नाना अलंकार मिले ,
बनके स्थिर घर -प्रांगण में प्रत्येक प्राणी मनुष्य को प्रफुल्लित करे |
अनेको कुकर्मो से युक्त इस पदभ्रस्ट भक्त के मार्गदर्शक बने |
हो मनोकामना यह मेरी पूरी , हर मनुष्य को कष्ट से मुक्ति मिले ,
हर साधारण कर्म में असाधारणता की अनुभूति मिले |
हो जाये हर रोगो से मुक्ति , रोजगार के नए आसार खुले ,
हे माँ ! स्वीकार करो इस दरिद्र की भक्ति ,
समाप्त करते हुए यह स्तोत्र मुझे मेरी भक्ति प्रसाद मिले |
|| जय माँ महालक्ष्मी ||