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Neech ka Chandra: Moon in Scorpio

Mere priya pathako, jyotish vuvechan me ask ka visual hai. Chandrama, jise hum pratyaksha dekh sakte Hai aur jiski urja mahsos kar sakte Hai. Aur sabhi nakshatro me chamdrama ka hi sthan mahatvapoorna kyu isle bare me bhi hum charcha karenge. Agar hum vaigyanik dristikon ki bat kare to hume sadaiv lagta hai ki humari kalpana ya soch ka koi pukhta saboot humarae same rah sake. Lekin kya ye har samay mumkin hai? Ha, mumkin Hai kyuki kisi bhi prakar ki urja usi cheez ird gird paye jati hai, Jo ki uske karib ho ya usase kisi na kisi prakar taluk rakhta ho. Jyotish vigyan ki is shrunkhla me, bahot we manviya bhavnatmak aivum rachnatmak sangyayo ka alankar kiya gaya Hai. Jaise hum jaante hai, agar hum kisi anya manav ke sampark me ate hai to usase kisi na kisi prakar ke Mel- bhav me karan hi hum uski aur aakrshit hote hai; Jo ki is shrusti ka sarvasadharan niyam hai. Aur jab us prani se prem karne lagte hai to use koti ke alankaro se sushobhit karte hai. Lekin ye tab hi mumkin jab aap us chiz aur dhyan kendrit karte Hai anyatha na hi uske hone wale prabhav na hi uski vilakshanta ka aapko gyan hoga. Usi prakar se ‘dhyan’ ek matra aisa astra hai jiske hone se San kuch mumkin hai air jiske na hone se kuch bhi nahi. Meri in kahi gayi bate aapke had din hone wale dincharya air paraspar samvad se taluk rakhti hai, jiske pukhta saboot paane ke liye koi bhautik, to koi rasaynik ya to koi jiv vigyan ki shakahaya se snatak ki upadhi prapt large hai air apne anubhavo ko apne hi andaz prastut karte Hai.

Hum phir se apne mudde ki aur badhate hai, yah mana jata chandrama, matru swarup Hai aur iski anek dant kathye bahot se purano me bhi upasthit hai. chandrama we sanchalit hone wali humare sharir me bahot si granthiya hai. jiske sanchar se hi manushya pragati nirdharit hoti Hai. Jisme ki neend ek bahot mahatva poirna yogdaan hai. Humare shahir aadhe se jyada jo vyadhiya hai unka mool karan hota hai neend ka na hona ya pura na hone. (to be continued)

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Kaliyug ka Mahabharat (Mahabharata of Kaliyuga (Dark Period)

कलियुग के संदर्भ मैंने कृष्ण से वार्तालाभ किया ,
क्या फिर से सतयुग आयेगा इसका भी प्रमाण लिया |
इस कलियुग के धृतराष्ट्र को अंधे होने का वरदान दिया,
सच की टकसाल को तुच्छ होने का अहसास दिया ,
दुर्योधन रूपी आकांशा एवम अभिमान को श्र्ष्ठता का वरदान दिया ,
दुशाशन के कृत्यों को भरी महफिल में सलाम किया |
चौसट के खेल को इसीलिए विश्व में सम्मान दिया ,
शकुनि रूपी आत्माओ को महात्मा होने का स्थान दिया |
बोल गीता माँ इस विश्व में सदाचार को कैसा कलियुगी अभिशाप दिया ,
कृष्ण बोल के थक गया , अर्जुन का बाण भी हो गया परास्त |
फिर महाभारत की संरचना का ये कैसा अभिप्राय मिला ,
हर युग हुआ संहार का सूचक, अंत में अधर्म का नाश किया ,
यह मनुष्य की संरचना ही थी भयंकर , जिसने संपूर्ण पृथिवी का सर्वनाश किया |
कृष्णा ने प्रस्तुत किया था उदाहरण , जो हर युग में क्रांति का सूचक बना ,
जो कहना चाहता था कुछ और शायद हमने और कुछ सुना |
इस पंक्ति के करता हु समाप्ति ,
अवोभायग्य हमारे जो फिर से कलियुग ने महाभारत रूपी अमृत का पान किया |
धन्यवाद !

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Vigyan(The Science): Ek Saral Rahasya (One Simplest mystery)

नमस्कार ! दी स्कॉलैस्टिक कि श्रृंखला में आपका स्वागत है | प्रकृति की इस नायाब दुनिया में बहोत से ऐसे रहस्य जो यथावत साधारण मानव के अधिकार क्षेत्र से परे है | इसके अनेक संदर्भ हमे हर समय होने वाली घटनाओ से पता चल जाता है | उसी प्रकार से मनुष्य का शरीर भी पांच महाभूतों की अनन्य श्रेणियों अलग अलग चरण में ना ना प्रकार के अनुभव होते है | इन अनुभवों को शायद सामान्य मनुष्य अपनी दैनंदिन के कामो में उलझे रहने के कारन पहचान नहीं पाता है , और उसे केवल मिथ्या या कल्पनाओ का आधार बताकर उन चीज़ो को टाल दिया करता है ; परनतु उससे होने वाले परिणाम जब सामने आते है तो चकित एवम हक्का बक्का रह जाता है | वर्त्तमान स्थिति में विज्ञानं को न केवल किसी औपचारिकता का दास बनाया गया है बल्कि उसका हनन भी किया गया है | मनुष्य विज्ञानं अनुक्रमण में आज हम बात करेंगे , उस विज्ञानं की जिसे बस ह्रयास का पात्र बनाया गया है | क्युकी मौजूदा स्थिति में इन घटनाओ की किसी ठोस सबूत न होने के कारन , इस शास्त्र को इस कलियुग के घिनोने दौर से गुजरना पद रहा है | इसी कारन कुछ बातो सरलता के से समाधान हो सके , इसीलिए हमने इस लेखन का चयन किया है | विज्ञानं की बातो को समझने के लिए हमे एक बात तो निश्चित करनी होगी , की आखिर इस काल में विज्ञान को ही क्यों शास्त्र बनाया गया है , और हमे हर विषय पर तर्क की ही क्यों आवश्यकता पड़ती है| क्यों , विश्वास की धरातल इतनी कमजोर हो गयी है , की जो चमत्कार हमे स्वयं अपने हाथो से करते थे , उनके लिए आज मानव निर्मित यंत्रो का उपयोग किया जा रहा है | विज्ञान , यह शब्द दरअसल किसी घटना के ज्ञान के सन्दर्भ में किया जाता है| और जब उस घटना का विशलेषण किया जाता है तो परपस्परिक रूप से वो ” विज्ञानं ” की मूलभूत उपाधि दी जाती है | किन्तु आज के काल में विज्ञान शब्द की धज्जिया उड़ा दी गयी है, आज हिंदी में कहे जाने वाले वैज्ञानिक संज्ञाओं झकझोर के रख दिया गया है | आज की शिक्षा प्रणाली , भाषाओ में उच्चता और नीचता के निर्णायक मापदंड बन चुके है | और हमारे मूलभूत सिद्धांतो को पतन की और अग्रसर हो रहे है | इन्हे अंकुश लगाना हमारे हाथ में है , उद्धार या पतन इसमें से किसी एक चुनना होगा ! आज के मनुष्य में मस्तिश्क के शुक्षम चक्षु , निष्क्रिय होते जा रहे है | जिसके कारण , सोचने और समझने की शक्ति को हर एक मापदंड की आवश्यकता पद रही है | जिस विज्ञानं की धरातल पे सबकुछ सामान्य उसे भी अनावश्यक तरीके से उलझा कर उसे प्रस्तुत किया जा रहा है | मनुष्य के जन्म के समय , अनेको ब्रम्हांड की गतिविधियों के कारण, ग्रहीय तालमेल बैठने या न बैठने के कारण , उनका प्रभाव मनुष्य शरीर पर प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष तरीके से पड़ता है | ठीक उसी प्रकार से जैसे की किसी इंसान के बोलने पर सामने वाले व्यक्ति पर उसका या तो सकरात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | जिस के करण, वह प्रभाव अल्पभाव , दीर्घाभाव में देखा जा सकता है | जैसे की , किसी दवा को धारण करने के बाद उसके प्रभाव शरीर पर पड़ते है ठीक उसी प्रकार से यह प्रभाव होते है | मनुष्य का शरीर हर समय अनेक तरंगो को उत्पन्न करता है , अगर इसे पहले के प्रभाव से जोड़कर देखा जाये तो हमारे मित्र (सकारात्मक ) और शत्रु (नाकाररत्मक ) का मिलजुला असर होता है | इसी प्रकार से संपूर्ण ब्रम्हांड में हम एक दूसरे से शारीरक , मानसिक रूप से भिन्न होते हुए भी हम आध्यात्मिक रूप से सहज है | जिस कारन हम किसी न किसी के साथ सम्भन्ध से जुड़े हुए है | घटना का स्वरुप कैसा भी हो पर उसकी नीव एक है , और एक ही मूलभूल सिद्धांत पे चलने वाले है | इसी कारन से प्रत्येक मनुष्य में किसी चीज़ो की अधिकता तो किसी तत्वों की न्यूनता का परिचायक होता है | इसप्रकार , सबसे पहले सोच का मेलभाव , फिर मित्र में तबदीली , फिर रिश्तेदारी (घनिस्टता ), फिर सगेसम्बन्धिया बनाना और फिर विनाश की और अग्रसर होने | यह सृष्टि के वैधानिक रूप कालांतर , देश , दिशा और समय के मापदंड अनुसार चलता आ रहा है | प्रकृती के इन्ही भौतिक नियम को समझने के प्रयास और उन्हें समझने हेतु प्राकृतिक उदाहरण का उपयोग किया जाता है | या संक्षिप्त में कहा जाये तो इसे असल मायने में “विज्ञानं” कहा जाता है | इसी के साथ इस कड़ी के साथ हम इजाजत चाहते है | इस खंड में उपयोग कि हुई भाषा या कथन से किसी के मन को पीड़ा पहुँची हो तो क्षमा करे ! ध्यानवाद !

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Goddess Lakshmi prayer to overcome Financial crisis

हे , महामाया महालक्ष्मी इस दिन दरिद्र भक्त की अर्ज सुनलो माँ ,
हे पद्मप्रिये विष्णुविलासिनि अब यह संकट को तारो माँ |
सुख -दुःख तो है सांसारिक भवसागर उसमे तुम ममता की नैय्या ,
चंचल रूप तुम्हारा देख हर मनुष्य की मिलती है दुःख की शैय्या |
ब्रम्हांड बना उत्पत्ति का सूचक , तुम दया की हो टकसाल,
वास्तविक रूप में जन जन के घर में निवास करती हो, ए ऊर्जावान ,
मै मुर्ख अपनी अज्ञानता में करता रहा तुम्हारा तिरस्कार,
किस मुख से करू अर्चना , भोग रहा हु तुम्हारा क्रोध विकराल |
स्वाधिस्ठान में तुम हो विराजित , मैंने पीड़ित किया तुम्हे दिन रात,
सत्य और ज्ञान का आधार हो तुम , न जान सका इस श्रुष्टि का विधान,
तुम्हारी चंचलता को देख , मन में अस्थिरता छायी ,
मस्तिस्क हो गया रोग ग्रस्त , नाना प्रकार की यातना आयी |
जन -मानस में हो तुम ज्ञान का प्रकाश , हे माँ उन् सब पे दया करो ,
अपनी स्तंभित कर देने वाली आभा से , उनका भाग्य प्रकशित करो |
नित चर एवम स्थिर रूप में उनके घर में निवास करो,
अपनी ममता से उन्हें दिन प्रतिदिन पोषित करो ,
अज्ञान रूपी उन्माद प्रत्येक मनुष्य के अंदर जागेगा ,
उसके आत्मा की पगडण्डी बनकर , उनका मार्ग प्रशस्त करो |
लक्ष्मी निहित हर प्रकार की ऊर्जा उस दिन मनुष्य के मन घर कर जाए ,
चाहकर भी वो मनुष्य अवचेतन ना हो पाए , भक्ति के सत्यार्थ को पान कर ,
वो फिर झिलमिलाये |
प्रारब्ध के बदलने की इच्छा उसे जगाये |
हो पुरुषार्थ की मूरत तुम आंतरिक भ्रमांड का संतुलन बनो ,
हर रूप में पूजी जाती हो तुम , अब नीज जन का उद्धार करो |
मनुष्य है दैवी और राक्षसःशी गुणों का धर्ता ,
उसका तुम आध्यात्म ज्ञान बनो, अपनी इस श्रुष्टि को फिर से नैतिक और ऊर्जावान करो|
भोग रहा है , भक्त तुम्हारा दारिद्रय की बेला को,
हर क्षण बना उपहास का पात्र , हुआ अपमानित हर गोधूलि बेला को ,
मनके , चांदी , सोना , वस्त्र एवम नाना अलंकार मिले ,
बनके स्थिर घर -प्रांगण में प्रत्येक प्राणी मनुष्य को प्रफुल्लित करे |
अनेको कुकर्मो से युक्त इस पदभ्रस्ट भक्त के मार्गदर्शक बने |
हो मनोकामना यह मेरी पूरी , हर मनुष्य को कष्ट से मुक्ति मिले ,
हर साधारण कर्म में असाधारणता की अनुभूति मिले |
हो जाये हर रोगो से मुक्ति , रोजगार के नए आसार खुले ,
हे माँ ! स्वीकार करो इस दरिद्र की भक्ति ,
समाप्त करते हुए यह स्तोत्र मुझे मेरी भक्ति प्रसाद मिले |
|| जय माँ महालक्ष्मी ||

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Introduction to Bio-informatics

I am Ankit Bisen, your tutor and beloved friend, guys hope you all doing well. I am a researcher cum bio- informatician present some of the important code blocks which essential from the present point of view. Bio- informatics, now a days being popular and emerging field which aspects the implementation of the bio-logical virtues to fullfil the emerging needs of the generation and to counteract the solution of problem of statement on a virtual scale. In a recent phase, globally the animal conservation acts are being actively executed to safeguard the well being of the experimental animal and thus framing newer avenues to minimise the gross utilization of animals on a broad scale. Hence, one such way is by utilizing virtual assets in predicting the plan of research and the most probable outcomes.

Bio-informatics, as the name only indicates which is derived from two words i.e Biological science and Information technology. Both the sects of the science carry their own pursuits and rather different in approach but by the emergence of the bio-informatics, which has become the connecting loop between the basic and application science. This interdisciplinary field has been employed in various sector and has successfully contributed in the developmental milestones in the field of genomics, and other life science research. Recently, the emergence of the biological medicines, vaccine and healthcare related research has accelerated by its application. It has become a resource of deposition of huge information bank for the biological data.

An impetus to the bioinformatics has been gained after the successful completion of the human genome project. Which is major project…..(to be continued)

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Re’fresh and Re’strain

Hi guys, once again in the series of Morning Sip with B’sen a heartiest welcome to all my viewers and reader. Sorry, for long time I have not been there nor a single courtesy from my side is even on the web chariot. As we know as you pass on the season changes, where the green chlorophyll finds its image as a partched yellow autumn foliage. Sometimes, situation transforms into such manner, where spells gets ambiguous to leave your mouth or not. We know the life is full of possibilities and happening, the events are in your card but the need is the guts to play them. Some players foreplay their tricks, some may react a bit, and some smile to trap the opponents activity. And show moves on everyone in their dogma of life have ascertain the pursuit of excellence. This excellence of the specified sector have become the hallmark of one identity. Sometimes,it may put you towards bright lime spotlight and sometimes may lead you as an absolute moron.

But the possess in the pweson’s life to have constructive approach to transform the point stone in your path to the holder of your clothes. the only thing in human pursuit which makes them unique is the stillness and hopeful attitude towards any event. Which might works as main modulator in the life of many successful pioneers. But what is the reason , that 99 % of the public remains uncommon and the commoners glorifies the throne of 1 % percent individual. You will might get surprise that I used a word common for the 1% because the chastity and superiority over the race can be sustain by becoming a simple not by mere means of dominating and peculiar. They last a little and vanish from the calendar just like foggy smoke. So, whether we have tried to come on the social platform and just try to connect several locus point to form a valuable conics. As we know there is not top without a bottom, so just try connect with a bottom it will lead to miraculous change in the persons life.

When we look towards the pyramid, it shows tapers towards path of their inclination Likewise whether you like or not you have to taper your unwanted behaviour and point you elegant bad deluxe behaviour towards the most uncommon public which you fine use’less. Just try to grant your all wishes not actually what you want, wait to gain the things what you are!

Reading this particular topic please convey you views to me. Whether implementing this in your life you feel Re’fresh or Re’strain.

Thank you

Ankiitz B’sen