Vigyan(The Science): Ek Saral Rahasya (One Simplest mystery)

नमस्कार ! दी स्कॉलैस्टिक कि श्रृंखला में आपका स्वागत है | प्रकृति की इस नायाब दुनिया में बहोत से ऐसे रहस्य जो यथावत साधारण मानव के अधिकार क्षेत्र से परे है | इसके अनेक संदर्भ हमे हर समय होने वाली घटनाओ से पता चल जाता है | उसी प्रकार से मनुष्य का शरीर भी पांच महाभूतों की अनन्य श्रेणियों अलग अलग चरण में ना ना प्रकार के अनुभव होते है | इन अनुभवों को शायद सामान्य मनुष्य अपनी दैनंदिन के कामो में उलझे रहने के कारन पहचान नहीं पाता है , और उसे केवल मिथ्या या कल्पनाओ का आधार बताकर उन चीज़ो को टाल दिया करता है ; परनतु उससे होने वाले परिणाम जब सामने आते है तो चकित एवम हक्का बक्का रह जाता है | वर्त्तमान स्थिति में विज्ञानं को न केवल किसी औपचारिकता का दास बनाया गया है बल्कि उसका हनन भी किया गया है | मनुष्य विज्ञानं अनुक्रमण में आज हम बात करेंगे , उस विज्ञानं की जिसे बस ह्रयास का पात्र बनाया गया है | क्युकी मौजूदा स्थिति में इन घटनाओ की किसी ठोस सबूत न होने के कारन , इस शास्त्र को इस कलियुग के घिनोने दौर से गुजरना पद रहा है | इसी कारन कुछ बातो सरलता के से समाधान हो सके , इसीलिए हमने इस लेखन का चयन किया है | विज्ञानं की बातो को समझने के लिए हमे एक बात तो निश्चित करनी होगी , की आखिर इस काल में विज्ञान को ही क्यों शास्त्र बनाया गया है , और हमे हर विषय पर तर्क की ही क्यों आवश्यकता पड़ती है| क्यों , विश्वास की धरातल इतनी कमजोर हो गयी है , की जो चमत्कार हमे स्वयं अपने हाथो से करते थे , उनके लिए आज मानव निर्मित यंत्रो का उपयोग किया जा रहा है | विज्ञान , यह शब्द दरअसल किसी घटना के ज्ञान के सन्दर्भ में किया जाता है| और जब उस घटना का विशलेषण किया जाता है तो परपस्परिक रूप से वो ” विज्ञानं ” की मूलभूत उपाधि दी जाती है | किन्तु आज के काल में विज्ञान शब्द की धज्जिया उड़ा दी गयी है, आज हिंदी में कहे जाने वाले वैज्ञानिक संज्ञाओं झकझोर के रख दिया गया है | आज की शिक्षा प्रणाली , भाषाओ में उच्चता और नीचता के निर्णायक मापदंड बन चुके है | और हमारे मूलभूत सिद्धांतो को पतन की और अग्रसर हो रहे है | इन्हे अंकुश लगाना हमारे हाथ में है , उद्धार या पतन इसमें से किसी एक चुनना होगा ! आज के मनुष्य में मस्तिश्क के शुक्षम चक्षु , निष्क्रिय होते जा रहे है | जिसके कारण , सोचने और समझने की शक्ति को हर एक मापदंड की आवश्यकता पद रही है | जिस विज्ञानं की धरातल पे सबकुछ सामान्य उसे भी अनावश्यक तरीके से उलझा कर उसे प्रस्तुत किया जा रहा है | मनुष्य के जन्म के समय , अनेको ब्रम्हांड की गतिविधियों के कारण, ग्रहीय तालमेल बैठने या न बैठने के कारण , उनका प्रभाव मनुष्य शरीर पर प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष तरीके से पड़ता है | ठीक उसी प्रकार से जैसे की किसी इंसान के बोलने पर सामने वाले व्यक्ति पर उसका या तो सकरात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | जिस के करण, वह प्रभाव अल्पभाव , दीर्घाभाव में देखा जा सकता है | जैसे की , किसी दवा को धारण करने के बाद उसके प्रभाव शरीर पर पड़ते है ठीक उसी प्रकार से यह प्रभाव होते है | मनुष्य का शरीर हर समय अनेक तरंगो को उत्पन्न करता है , अगर इसे पहले के प्रभाव से जोड़कर देखा जाये तो हमारे मित्र (सकारात्मक ) और शत्रु (नाकाररत्मक ) का मिलजुला असर होता है | इसी प्रकार से संपूर्ण ब्रम्हांड में हम एक दूसरे से शारीरक , मानसिक रूप से भिन्न होते हुए भी हम आध्यात्मिक रूप से सहज है | जिस कारन हम किसी न किसी के साथ सम्भन्ध से जुड़े हुए है | घटना का स्वरुप कैसा भी हो पर उसकी नीव एक है , और एक ही मूलभूल सिद्धांत पे चलने वाले है | इसी कारन से प्रत्येक मनुष्य में किसी चीज़ो की अधिकता तो किसी तत्वों की न्यूनता का परिचायक होता है | इसप्रकार , सबसे पहले सोच का मेलभाव , फिर मित्र में तबदीली , फिर रिश्तेदारी (घनिस्टता ), फिर सगेसम्बन्धिया बनाना और फिर विनाश की और अग्रसर होने | यह सृष्टि के वैधानिक रूप कालांतर , देश , दिशा और समय के मापदंड अनुसार चलता आ रहा है | प्रकृती के इन्ही भौतिक नियम को समझने के प्रयास और उन्हें समझने हेतु प्राकृतिक उदाहरण का उपयोग किया जाता है | या संक्षिप्त में कहा जाये तो इसे असल मायने में “विज्ञानं” कहा जाता है | इसी के साथ इस कड़ी के साथ हम इजाजत चाहते है | इस खंड में उपयोग कि हुई भाषा या कथन से किसी के मन को पीड़ा पहुँची हो तो क्षमा करे ! ध्यानवाद !

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